बात का घाव

बात का घाव – एक राजा था । उसके दो बेटे थे । बड़े बेटे का नाम आकाश था और छोटे बेटे का नाम विशाल था । बड़ा राजकुमार आकाश अक्सर जंगल में शिकार खेलने जाया करता था और राज-काज में राजा का हाथ बटाया करता था । राजा उसे चाहता भी बहुत था ।

उसने बड़ी धूमधाम से उसका विवाह एक सुंदर राजकुमारी से कर दिया । छोटे राजकुमार को गाने-बजाने का शौक था । वह बहादुर भी था । तीरंदाजी में उसका कोई मुकाबला नहीं था । उसका निशाना अचूक होता था । चित्रकार भी वह आला दर्जे का था ।

देश-विदेश घूमना उसे बहुत भाता था । उसके दो मित्र थे । एक था मद्रसेन, वह जादूगर था । दूसरा था नरहरि । वह पहलवान था । राजकुमार विशाल एक बहुत ही कुवल धावक भी था । उसे घुड़सवारी बहुत अच्छी लगती थी । तीनों में गहरी मित्रता थी ।

बड़े राजकुमार को राजा ने कुछ दिनों के लिए पड़ोस के एक देश में भेज दिया था । अत: उसकी पत्नी अपने महल में अकेली ही रहती थी । एक दिन उसने विशाल को अपने पास बुलाया और अपने हाथ का बना हुआ भोजन उसे करवाया ।

फिर पूछा : ”कहो देवरजी ! कैसा बना है खाना ?” ”भोजन तो बहुत बढ़िया बना है, लेकिन सब्जी में थोड़ा नमक कम है ।” राजकुमार विशाल ने हंसकर कहा । राजकुमार के ऐसा कहने पर उसकी भाभी चिढ़ गई । बोली : ”यदि ऐसा है तो ले आओ न अपने लिए कोई समुद्री परी ।

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वही तुम्हें अच्छा खाना बनाकर खिलाया करेगी ।” ”कहां मिलेगी वह ।” विशाल ने पूछा । “मैं क्या जानुं ? ढूंढो तो मिल जाएगी, बड़े बनते हो न ।” भाभी ने तुनककर मुंह फूलते हुए कहा । छोटा राजकुमार भी गर्म हो गया । बोला : ”ताना मत मारो भाभी । अब तो समुद्र परी को लाकर ही इस घर में खाना खाऊंगा ।”

राजकुमार नाराज होकर जाने लगे तो भाभी ने कहा : ”तुम तो नाराज हो गए  देवरजी ! मैंने तो तुमसे ठिठोली की थी ।” विशाल ने कोई उत्तर न दिया । वह अपने मित्रों को साथ लेकर राजा के पास पहुंचा और बोला : ”पिताजी! मैं समुद्र परी के साथ विवाह करूंगा ।

मैं उसको ढूंढने के लिए जा रहा हूं ।” राजा ने पूछा : ”कहां मिलेगी वह समुद्र परी ?” ”पता नहीं, पर मैं पता लगाकर रहूंगा ।” राजा और उसके मंत्री ने विशाल को बहुत समझाया कि वह यह पागलपन छोड़ दे पर उसने एक न सुनी और अपनी बात पर अड़ा ही रहा ।

उसकी जिद के सामने किसी की न चली । उसकी भाभी बहुत पछताई कि ऐसी कड़वी बात उसके मुंह से कैसे निकल गई । राजा ने कहा : ”अच्छा! जब जाना ही चाहते हो तो साथ में कुछ सैनिक और धन भी ले जाओ ।”  राजकुमार बोला : ”नहीं पिताजी ! मुझे कुछ नहीं चाहिए । बस आप अपना आशीर्वाद दे दीजिए ।”

”क्यों क्या अकेले ही जाओगे?” राजा ने पूछा । ”नहीं, मेरे दोनों मित्र, भद्रसेन और नरहरि भी मेरे साथ रहेंगे ।” राजा ने तब उदास होकर भारी मन से उसे विदा किया । मंत्री ने खजाने से अशर्फियों के थैले मंगवाकर तीनों घोड़ों पर लदवा दिए । दूसरे दिन सवेरे होते ही तीनों मित्र समुद्र परी की तलाश में चल पड़े ।

वहाँ राजधानी में बड़ी चहल-पहल दिखलाई पड़ी । शहर के लोग एक खास दिशा में तेजी से बड़े चले जा रहे थे । भद्रसेन जो राजकुमार का जादूगर मित्र था, उसने एक सड़क पर जाते व्यक्ति से पूछा : ”क्या बात है मित्र! ये लोग कहाँ जा रहे हैं ?”

उस व्यक्ति ने हैरानी से उसकी ओर देखकर कहा-इस शहर में नए आए जान पड़ते हो । जानते नहीं डाकू शमशेर सिंह पकड़ा गया है । राजा उसे फांसी पर चढ़ाएंगे । वहीं जा रहे है हम सब लोग ।”  राजकुमार भी अपने साथियों के साथ वहीं जा पहुंचा । देखा, एक ऊंचे चबूतरे पर बड़े लम्बे-चौड़े डील-डौल वाला हट्‌टा-कट्‌टा आदमी खड़ा है ।

उसे ही फांसी लगने वाली थी, फिर भी वह हंस रहा था । डरना तो वह जानता ही नहीं था । उसकी आखों में तेज था और चेहरे पर रौब । राजा और उसके मंत्री को छोटे राजकुमार ने अपना परिचय दिया । राजा उसके पिता का मित्र निकला ।

उन तीनों से मिलकर वह बहुत खुश हुआ । राजकुमार ने राजा से कहा-महाराज!आप इसे फांसी क्यों देना चाहते हैं ?  राजा बोला : “यह बड़ा खूंखार डाकू है । इसने सैकड़ों लोगों को मारा है । हजारों घरों को जला दिया है ।” राजकुमार ने कहा : ”फांसी पर बढ़ाने से इसका क्या भला होगा ।

आप इसे मुझे सौंप दीजिए । मैं इसे अपने साथ लै जाऊंगा ।” राजा ने आश्चर्य से कहा : “आप इस खूंखार डाकू को साथ ले जाना चाहते हैं । मगर क्यों ?” राजकुमार ने कहा : “यह एक बहादुर इंसान है । मेरे साथ रहेगा तो मैं इअसे सुधार दूंगा ।”

राजा ने मंत्री की ओर देखा । मंत्री ने कहा : ”अगर इसने आपको भी धोखा दे दिया तो…?”  ‘नहीं देगा, मेरा मन कहता है कि यह बदल जाएगा ।’ ”ठीक है, तब तुम इसे ले जाओ अपने साथ ।”  राजा बोला : ”लेकिन इससे संभलकर रहना ।” उसके बाद शमशेर राजकुमार के साथ हो लिया ।

क्योंकि राजकुमार ने उसे फांसी पर चढ़ने से बचाया था ।  अत: वह उसका पक्का मित्र बन गया । अब चारों मित्र चल पड़े ‘समुद्र परी’ की खोज में । शमशेर ने अपने साथियों को भी साथ में ले लिया । चलते-चलते शाम हो गई । सूरज डूबने को हुआ ।

डूबते सूरज की लाल किरणों से पहाड़ों की चोटियां लाल हो उठी । पेड़ों पर पक्षी चहचहाने लगे । एक पहाड़ी नदी के किनारे पीपल के पेड़ के नीचे राजकुमार और उसके दोस्तों तथा शमशेर के साथियों ने पड़ाव डाला । राजकुमार ने कहा : ”ऐसे काम नहीं होगा ।

हम कहां तक चलते रहेंगे ? समुद्र परी के रहने की जगह का ठीक पता लगाकर ही आगे बढ़ा जाए ।” शमशेर बोला : ”पहाड़ की ऊंची चोटी पर एक गुफा है । वहां एक साधु रहता है । शायद उसे पता हो समुद्र परी के बारे में ।” राजकुमार का मित्र जादूगर मित्र भद्रसेन बोला : “मेरे पास जादू के दो घोड़े हैं ।

राजकुमार और मैं उन पर चढ़कर थोड़ी ही देर में वहां पहुंचकर उनसे मिलकर समुद्र परी का पता पा लेंगे । वे घोड़े बहुत ऊंचे और तेज उड़ने वाले हैं ।” राजकुमार कहने लगा : “मैं तो यही रहुंगा । तुम और शमशेर झटपट जाकर पता लगाकर आओ । हो सके तो उस साधु बाबा को भी यहां ले आना ।”

उसके बाद दोनों जादुई घोड़ो पर सवार होकर पहाड़ चोटी पर जा । वहां उन्होंने एक सापु । बाबा चट्‌टान पर बैठे तपस्या लीन खा । सा बाबा क निकट ।  साधु बाबा बोले : उनके आने का कारण आहा शमशेर न उघु सब बाई कह सुनाई ।

सझ परक बात सुनकर वह चौक उसका पता बता पर समुद्र अल सुन रखा उसे पाना बहुत मुस्किल है । बहुतों ने उसे पाने की कोशिश में अपने प्राण गंवा दिए है ।” शमशेर बोला : ”महात्माजी ! आपका आशीर्वाद चाहिए । यह काम तो होना ही है । राजकुमार आपके कल दर्शन करेंगे ।”

साधु बाबा बोले : ”यहां से एक हजार कोस दक्षिण की दिशा में एक समुद्र है । वहां से तुम्हें जहाज पर सवार होकर समुद्र में दूर तक जाना होगा । वहां तुम्हें एक टापू मिलेगा ।  टापू की ऊंची पहाड़ी की चोटी पर एक बहुत बड़ा किला है । उस टापू की रक्षा असख्य राक्षस रात-दिन किया करते है ।

वही पर राक्षसों के राजा ने समुद्र परी को कैद कर रखा है । राक्षसों का वह राजा बहुत ही बलवान है । उसका शरीर पहाड़ जैसा है । उसके माथे से पुआ-सा निकलता है, आखें बिजली-सी चमकती हैं । बोलता है तो मानो बादल गरजता हो ।

उसके प्राण पिंजरे में रखे एक तोते में है जिसकी रक्षा उसकी मी धनुष-बाण और तलवार हाथ में लेकर करती है । सुनते है वहाँ जो जाता है वह वापस नहीं लौटता ।” “हुम्म !” जादूगर भद्रसेन बोला : ”महात्माजी! आपकी सहायता मिल जाए तो सब कुछ संभव हो सकता है ।

बस हमें आपका आशीर्वाद चाहिए ।” साधु बाबा ने अपनी पोटली टटोली और एक टोपी निकालकर कहा : ”यह एक करामाती टोपी है । इसे पहनने वाला तो सबको देख सकता है, किंतु उसे कोई नहीं देख सकता और यह है वह तलवार, जो छिपे-छिपे वार करती जाती है । यह भी रख लो ।

एक तीसरी चीज भी मेरे पास है । वह है यह त्रिशूल पानी को सुखा सकता है, आग को बुझा सकता है, आसमान में उड़ते हुए किसी भी यान या पक्षी को भी नीचे गिरा सकता है । ये तीनों करामाती चीजें मेरी तरफ से राजकुमार को दे देना । अब तुम जाओ ।

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समुद्र परी को लेकर ही मुझसे मिलना । हां, लौटते समय पीछे की ओर देखने को राजकुमार से मना कर देना । समुद्र परी को लेकर तुरंत पल-भर की देर किए बिना तुम सब चल पड़ना । मैं भी अब कहीं जाने वाला हूँ । लौटने पर मैं तुम्हें यही मिलूंगा ।”

शमशेर और जादूगर भद्रसेन ने जाकर राजकुमार को सब बातें बताईं और साधु बाबा की दी हुई चमत्कारी वस्तुएं उसे सौंप दी । राजकुमार तब अपने दल के साथ दक्षिण दिशा की ओर चल पड़ा । वह आगे-ही-आगे बढ़ता गया । बीच-बीच में विश्राम के लिए वे सब कुछ देर के लिए रुकते भी गए ।

एक दिन राजकुमार रात के समय एक नदी में स्नान रहा थातोएक विचित्र घटना घटी । एक जलपरी नेराजक्मुारकोपानी मेंखींच लिया और उसे लेकर अपनी रानी के पास जा पहुंची । राजक्मुा ने नदी के बीचो बीच स्वर्य कीएक सुंदर बाग में पाया ।

वहां वृक्षों की डालियो पर सुनहरे फूल और फल लगे हुए थे । सुनहरी चिड़िया चहचहा रही थी । तालाबों में रंग-बिरंगी मछलियां तैर रही थी । बाग के बीच में एक संग मरमर का खूबसूरत महल बना था । उसे एक बहुत बड़े कमरे में पहुंचाया गया ।

उस कमरेकी छत और दीवारे सोने की बनी थी । सब जगह हीरे, नीलम और पन्ने बिछे थे । कमरे के मध्य में एक फेर सिंहासन था, जिसमें हीरे-पल्ले-चमचमा रहे थे । बीस-पच्चीस परियांहाथ जोड़ेखड़ी थी । सिंहासन पर सोने का मुकुट और लाल रग की पोशाक पहने परियों की रानी ‘लाल परी’ बैठी थी ।

उसके शरीर से करता की लहरे उठ रही थी । उसके मुख पर एक अनोखी ज्योति जगमगा रही थी । फूलेकी भीनी-भीनी सुगध उसके शरीर से निकलकर चारों ओर फैल रही थी । जलपरी ने राजकुमार की ओर संक्ते करके लाल परी से कहा : ‘महारानीजी ! यह युवक रात के समय नदी में स्नान कर रहा था ।

आपके आदेशानुसार रात के समय नदी में स्नान करना वर्जित है । अत: मैं इसे आपके पास ले आई हूं ।’  परियों की रानी ने अपनी जादूकी छड़ी उठाई और कहा : ”ठीक है । अब तुम सब यहां से चली जाओ । हम इससे अकेले में वार्तालाप करेंगे ।”

जब सब परियां वही से चली गईं तो परी ने कहा : ”युवक ! तुम कौन हो ? और कहा जा रहे हो ? तुम्हारे जैसा खूबसूरत नौजवान मैंने पहले कभी नहीं देखा । तुम यही पर क्यों नहीं रुक जाते ?”  राजकुमार ने कहा : ”मैं एक देश का राजकुमार हू ।

मैं समुद्र परी की तलाश में निकला हूँ । मेरे संगी-साथी भी नदी के किनारे ठहरे हुए है । मुझे जाने दीजिए । वे मेरा इतजार कर रहे होंगे ।”  परी रानी मुस्कराकर बोलीं : ”विवाह करोगे उससे ? वह मेरी सहेली है । उसको एक बलवान राक्षस चुराकर ले गया है ।

कैद कर लिया है उसने उसे । वहा तक पहुचना बहुत कठिन है । अपने साथियों के साथ यही रहो । यहां मेरा राज्य है और तुम चाहो तो यहा के राजा बन सकते हो ।”  राजकुमार बोला : ”पहले आपकी सहेली को कैद से छुड़ा लाऊ, फिर आकर आपकी बात पर गौर करूंगा ।

वैसे सुंदर आप भी कम नहीं हैं ।” परी रानी मुस्कराई । ऐसा लगा जैसे चारों ओर फूल बरसने लगे ही । वह बोली : ”अच्छा ! यही सही, पर लौटते समय यहाँ जरूर आना । अमृत रस पी जाओ । तुममें दस हजार हाथियों का बल आ जाएगा और यह झोली लेलो ।

इससे जितनी भी कोई भी चीज मांगोगे, सब मिल जाएगी । बढ़िया स्वादिष्ट भोजन, हीरे-जवाहरात, अशर्फी सब-कुछ । इसमें एक ऐसी जड़ी है, जिसको सुंघाने से घाव तुरंत भर जाते हैं और इसको हथेली पर रगड़ते ही आस-पास के लोग बेहोश हो जाते है ।

मेरे पास तेज उड़ने वाला एक उड़नखटोला भी है । उसमें जितने भी लोग बैठेंगे, उसी के अनुपात से उसका आकार बढ़ जाएगा । वह ताली बजाने पर अपने आप ही आसमान में ठहर जाएगा । आग और पानी में भी वह उड़ता रहेगा । वह भी मैं तुम्हें दे देती हूं ।” यह कहकर परी रानी ने ताली बजाई ।

दो परियां तुरत वहां आ पहुंची । परी रानी ने दोनों के कान में कुछ कहा । जादू की छड़ी पुमाई तो सब चीजें वहां आ गईं । दोनों परियों ने राजकुमार को नदी के किनारे पहुंचा दिया । राजकुमार ने परी रानी से प्राप्त की हुई सारी चीजें अपने साथियों को दिखाईं ।

जादूगर बोला : ”राजकुमार। सचमुच आप बहुत भाग्यशाली हैं । ऐसी अनोखी चीजें आसानी से नहीं मिला करतीं ।” राजकुमार का दूसरा मित्र बोला : ”अब तो समुद्र परी हमें मिलकर ही रहेगी ।” शमशेर सिंह बहुत खुश था । उसने कहा : ”राजकुमार! अब हम चारों को उड़न खटोले में बैठकर जल्दी-से-जल्दी समुद्र परी के पास पहुचना चाहिए ।

जाद्रार मित्र तुम अपना जादू का झोला भी साथ ले लो । हां, आवश्यक सामग्री ले चलना मत भूलना ।” उड़न खटोले ने उन्हें एक ही दिन में समुद्र के किनारे पहुंचा दिया । पहलवान मित्र नरहरि को किनारे छोड्‌कर तीनों मित्र उडनखटोले में बैठकर समुद्र में स्थित टापू पर पहुंचे ।

भद्रसेन ने जादुई घोड़ा अपने पहलवान मित्र नरहरि को देकर कहा : ”तुम पहाड़ी की सबसे ऊंची चोटी पर आग जलाए रखना । ध्यान रहे, आग बुझने न पाए । हम सब जल्दी ही लौटे । लड़ने के लिए तैयार रहना । हमारा पीछा करने के लिए बहुत-से राक्षस दौड़े-दौड़े आएंगे ।

उस समय तुम्हें अपनी बहादुरी का प्रदर्शन करना है ।” टापू पर पलकर उन्होंने ऊंची पहाड़ी पर बने ण्डा बड़े किले को देखा । रात के अंधेरे में सबकी निगाहें बचाते हुए वे किले के ऊंचे बुर्ज पर पहुंच गए । राजकुमार ने महात्मा की दी हुई टोपी पहनी, एक हाथ में परी रानी की बड़ी-बूटी और दूसरे हाथ में महात्मा की बिना रुके खचाखच चलने वाली तलवार ले ली ।

भद्रसेन ने जादू का झोला सभाला और शमशेर ने साधु बाबा का त्रिशूल हाथ में ले लिया । भद्रसेन ने अपने और शमशेर के ऊपर जादू की चादर डाल रखी थी । उन्हें कोई देख नहीं पा रहा था । जादू के थैले से निकालकर भद्रसेन ने सबकी आखों में सुरमा लगा दिया था, इसलिए वे सब दूर-दूर की चीजें अंधेरे में भी देख सकते थे ।

त्रिशुल हाथ में लेकर तीनों ने छुआ और बे-खटके किले की खाई और आग की लपटों से बेदाग बच निकले । उनका उड़नखटोला बिना आवाज किए उड़ रहा था । त्रिशूल को हाथ में लेकर शमशेर ने किले की छत पर अपना उड़नखटोला रोका ।

भद्रसेन के पास एक ऐसा यत्र था, जिसकी सुई किले में पुसते ही समुद्र परी के कमरे की ओरघूम गई । राजकुमार आगे बढ़ा । शमशेर ने अपने हाथ में पकड़े त्रिभूल से उस दरवाजे को धक्का दिया तो कमरा अपने आप खुल गया । राजकुमार ने तुरंत बूटी हथेली पर रगड़ी ।

बूटी रगड़ते ही आस-पास के सभी लोग बेहोश हो गए । अपनी तलवार से राजकुमार ने समुद्र परी के बंधन काटे । भद्रसेन ने तुरंत उसे अपने जादू के थैले में बंदकर जादू से उडनखटोले में पहुंचा दिया । दूसरे कमरे में राक्षस गहरी नींद में सो रहा था, उसकी मां पिंजरे में बंद तोते की रक्षा कर रही थी ।

राजकुमार ने फिर से हथेली पर बूटी रगड़ी । ऐसा करते ही राक्षस की मां बेहोश हो गई । उसके बेहोश होते ही राजकुमार ने तोते की गर्दन मरोड़ दी । राक्षस सोते-सोते ही ढेर हो गया । अब तीनों ने जल्दी-जल्दी एक चोर रास्ते का पता लगाया और छत पर पहुंच गए ।

फिर वे तत्काल ही वहां से उड़ गए । समुद्र परी को तो भद्रसेन ने पहले ही अपने जादू से थैले में बंद करके अपने विमान पर पहुंचा दिया था । थोड़ी ही देर बाद राक्षसों की बेहोशी टूटी । सारे पहरेदार जाग उठे । अपने स्वामी को मरा देखा तो सब राक्षसों में तहलका मच गया ।

तब तक उड़नखटोला काफी दूर जा चुका था । राक्षसों ने अपने यानी पर सवार होकर उनका पीछा किया, पर शमशेर ने उन्हें चमत्कारी त्रिभूल की सहायता से हवा में ही काट गिराया । इधर राजकुमार भी बूटी अपने हथेली पर रगड़ रहा था, जिसके कारण राक्षस बेहोश होते जा रहे थे ।

उसकी जादुई तलवार भी छपाछप चल रही थी । राजकुमर और उसके साथी जादुई टोपी और जहई चादर ओढ़े हुए थे इसलिए वे राक्षसों को नजर नहीं आ रहे थे । बात-ही-बात में सबने मिलकर राक्षसों का सर्वनाश कर दिया । जो किसी तरह से द्वीप पर पक्ष गए उनका सफाया नरहरि ने कर दिया ।

फिर जब मैदान पूरी तरह से साफ हो गया तो वे सब उडनखटोले में बैठकर वापस लौट गए । दूसरे दिन सब पहाड़ी वाली गुफा में साधु बाबा से मिले । उन सबको प्रसन्न देखकर साधु बाबा ने समझ लिया कि उनका काम बन गया है । राजङ्कार ने साधु बाबा के चरण छूए ।

साधु बाबा ने आशीर्वाद देते हुए कहा : “ईश्वर उन्हीं की मदद करता है जो हिम्मत से काम लेकर आगे बढ़ते हैं और मुसीबतों से घबराते नहीं हैं । राजकुमार एक नेक दिल इसान है, वह बहादुर है और उसका दिल साफ है ।” राजकुमार जब साधु बाबा की दी हुई चीजें लौटाने लगा तो वे बोले: “बच्चा ! मैंने यह चीजें तुम्हें भेंट में दी थी । अब यह तुम्हारे काम आएंगी । इन्हें तुम अपने पास ही रखी ।”

सापु बाबा से विदा लेकर चारों मित्र परी रानी के पास पहुंचे । वहा शमशेर के साथी उनका इंतजार कर रहे थे । परियों की रानी अपनी सहेली समुद्र परी से मिलकर बहुत प्रसन्न हुई ।  अभी तक वह राजकुमार की सुंदरता पर ही मोहित थी, अब उसकी वीरता की ओर उसका ध्यान गया ।

वह सोचने लगी कि ऐसी सुंदरता और वहासरी बहुत कम देखने को मिलती है । राजकुमार के वहां पहुंचने पर परियों ने बड़ा उत्सव मनाया । राजकुमार ने गाया-बजाया । उसके गाने से समुद्र परी बहुत खुश हुई । परी रानी ने राजकुमार की बहादुरी की बहुत प्रशंसा की ।

परी रानी ने कहा : ”तुमको दो-दो परियां मिली हैं तो तुम्हारे साथियों को भी कम-से-कम एक-एक तो मिलनी ही चाहिए । चलो हम लोग चलते है । तुम्हारे दोस्त अपनी मनपसंद परियों को स्वयं चुन लेंगे ।”  राजकुमार ने मुस्कराकर कहा-यह तो आपने मेरे मन की बात कह दी ।

चारों दोस्त पांच परियों को लेकर अपने देश की ओर बड़े । ये लोग नगर से दूर एक तालाब के किनारे स्थित एक बाग में उतरे । नरहरि को राजझार ने अपने पिता के पास भेजा । बड़ा राजझार अपने छोटे भाई के आने से बह्म प्रसन्न ह्मा ।

उसक बड़ा भाई उसी दिन से अपनी पत्नी से नाराज था, जिस दिन से उसने अपने देवर को समुद्र परी लाने के लिए ताना मारा था । वह कहता था कि जली-कटी बातें सुनकर उसका छोटा भाई घर छोड्‌कर चला गया था । हंसी में भी बेसमझी की बात करना ठीक नहीं ।

अक्सर बात बिगड़ जाती है, तब पछताना ही पड़ता है । राजा, बड़ा राजकुमार तथा मंत्री सभी छोटे राजकुमार का स्वागत करने के लिए बाग में पहुंचे । खूब धूमधाम और गाजे-बाजे के साथ छोटे राजकुमार का स्वागत किया गया ।

हाथियों पर सोने-चांदी के हौदों में राजा, राजकुमार, रानियां तथा बड़ा राजकुमार बैठा था । उसके पीछे सजे हुए घोड़ों पर बड़े-बड़े सरदार तथा दरबारी थे । बीच में वर्दी पहने हथियारबंद सिपाहियों की भारी पलटन थी । समुद्र परी और परी रानी ने अपने जादू से बड़े-बड़े संगमरमर के महल क्षण-भर में ही तैयार कर दिए ।

परी रानी द्वारा जादुई छड़ी पुमाते ही वहां बड़ी धूमधाम और ठाठ-बाट हो गए । परियों ने जादू के जोर से अपने मां-बाप को बुलवा लिया । चारों तरफ सोने-चांदी से मड़े रंग-बिरंगे । शामियाने लग गए । रात-भर जश्न मनाया गया ।

परियों के वैभव को देखकर सभी चकित रह गए । दूसरे दिन छोटे राजकुमार के तीनों दोस्तों का विवाह तीन परियों से हो गया । बड़ा राजकुमार बहुत खुश था । उसने अपने छोटे भाई को प्यार से गले लगाया । राजा ने छोटे राजकुमार के कहने पर शमशेर को सेनापति बना दिया ।

राजकुमार के दोस्त जादूगर भद्रसेन और पहलवान नरहरि को भी राजदरबार में अच्छे पदों पर नियुक्त कर दिया गया । बड़े राजकुमार की रानी बहुत लज्जित थी । वह कटी-कटी-सी रहती थी । वह खुले मन से किसी से बोल भी नहीं पाती थी ।

एक दिन छोटा राजकुमार दोनों परियों को लेकर अपनी भाभी के पास पहुंचा और प्यार से अपनी दोनों पत्नियों से कहा : ”मेरी इन भाभी के झुककर चरण छुओ । इन्हें प्रणाम करो । इन्हीं के कारण मैं तुम्हें पा सका हूं । अगर ये न होती तो हम सब कभी मिल नहीं पाते ।”

दोनों परियों ने झुककर अपनी जेठानी के चरण छुए । छोटा राजकुमार बोला : ”भाभी! तुमने मुझ पर बहुत उपकार किया है । न तुम उस दिन मुझे समुद्र परी लाने को उकसाती और न मैं कभी समुद्र परी को पाता । यह सब तुम्हारे उसी ताने की वजह से संभव हुआ है ।”

भाभी ने हंसकर कहा : ”शर्मिंदा मत करो देवरजी ! मैंने तो उस दिन तुमसे हंसी-हंसी में वह बात कही थी । पर तुम सहज ही बुरा मान गए । मैं सच कहती है बाद में मुझे बहुत दुख हुआ । पर करती भी क्या ? जबान से निकली हुई बात और तरकश से छोड़ा हुआ तीर कभी वापस नहीं आता है ।”

छोटे राजकुमार ने जब भाभी की ठिठोली की बात समुद्र परी को बताई तो वह बहुत हंसी । वह मुस्कराकर बोली : ”तब तो मैं आज अपने हाथों से भोजन बनाकर तुम दोनों को खिलाऊंगी । पर मेरे बनाए भोजन में यदि कुछ कमी रह जाए तो मुझे क्षमा कर देना और अपना मनपसंद भोजन बनवाने के लिए किसी और परी को ले आना ।”

परी की बात सुनकर सब हस पड़े । इतने में बड़ा राजकुमार भी वहा पहुचा । छोटा राजकुमार बोला : ”बड़े भैया आ गए है । अब तुम हम सबके लिए खाना परोस दो । बड़े जोर की भूख लगी है ।” समुद्र परी के हाथ का बना खाना सब लोगों ने बड़े चाव से खाया ।

सब उसकी प्रशसा करने लगे । छोटे राजकुमार ने अपनी भाभी से पूछा : ”भाभी! भोजन कैसा बना है ? कुछ कमी तो नहीं है ?”  भाभी मुस्कराकर बोलीं : ”यदि मैं यह कह दूं कि नमक ज्यादा है तो कौन-सी नई परी लाअणै ?” इस पर सब ठहाका मारकर हंस पड़े । वातावरण मुखरित हो उठा ।

शिक्षा:

हंसी-मजाक करते समय सयंम बरतो । कभी-कभी मजाक में कही हुई बात मी झगड़े का कारण बन जाती है । महाभारत का युद्ध द्रोपदी से परिहास करने के कारण ही हुआ ।

By Ruchi

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