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गेलान गांव जंगल के किनारे बसा था । वहां की धरती उपजाऊ और पानी मीठा था । लोग मिल-जुलकर रहते और मेहनत से काम करते थे । येरान इस गांव का सबसे सुंदर, साहसी और नेक दिल युवक था ।  वह हर किसी की सहायता के लिए तत्पर रहता था, इसलिए गांव वाले उसे जी-जान से चाहते थे ।

बस, एक तोशा पहलवान उसे पसंद नहीं करता था । वह उससे जलता था । फिर भी येरान उसे पूरा सम्मान देता था । तोशा का बेटा तो येरान की गोद में खेलकर ही बड़ा हुआ था । तोशा की पत्नी इरना येरान को अपना भाई मानती थी ।

एक बार गांव में एक परदेसी ने आकर डेरा डाला । उसकी बातों में बला का जादू था । धीरे-धीरे उसने लोगों को गुमराह करना शुरू कर दिया । येरान लोगों को समझाता रहा, पर उसकी कौन सुनता ? परदेसी लोगों में फूट डालकर चलता बना ।

देखते-ही-देखते गेलान गाँव के लोग एक-दूसरे के खून के प्यासे बन गए । बहुत-से परिवार उजड़ गए, घर जलकर राख हो गए । हर व्यक्ति दूसरे पर संदेह करने लगा । डर के कारण लोगों ने खेतों पर काम करने जाना बंद कर दिया । खेत जंगल बन गए, जिस पर ऊंची, कंटीली झाड़ियां खड़ी हो गई ।

धीरे-धीरे पालतू जानवर मरने लगे और तालाब, कुएं गंदे होकर सड़ने लगे । समय बीता, लोगों को येरान की बातें याद आने लगी । सबको पछतावा हुआ, पर अब देर बहुत हो चुकी थी । सब कुछ खत्म हो चुका था । हंसता-खेलता गांव भूतों का डेरा बन चुका था ।

न खाने को अन्न था और न पीने को साफ पानी । येरान ने सब को इकट्‌ठा किया और सुझाया कि सब लोग क्यु समय केलिए कहीं और चलेजाएं, परजाएं कहां, यह तय न हो सका । तभी येरान की पड़ोसन इरना ने विनती की : “मेरे बच्चे तीन दिन से भूखे हैं ।

किसी के पास खाने के लिए कुछ हो तो खुदा के लिए मुझे दे दो ।” सभी ने आखें झुका ली । किसी के पास कुछ होता तो देता और कुछन-कुछ अपने बच्चों के लिए भी तो रखना ही था । सूरज ढल चुका था । बस्ती में सन्नाटा छा गया था । येरान को नींद नहीं आ रही थी ।

वह उठा और जंगल की ओर चल दिया । अंधेरे में वह बार-बार झाड़ियों में उलझता और कांटों की चुभन झेलता हुआ जंगल के बीच में पहुंच गया, पर एक भी फल उसके हाथ न लगा । उदास और निराश येरान स्वयं से बोला : ‘अब मैं क्या ले जाऊं उन बच्चों के लिए ? काश ! उजियारा होता !’

तभी जंगल दूर-दूर तक सुनहरे प्रकाश से जगमगा उठा । येरान ने देखा, एक सुनहरे पंखों वाली परी उसकी ओर देख रही थी । वह बोली : ”येरान! तुम जैसे नेक दिल इसान की मदद करने में हमें प्रसन्नता होती है । इस जगल के फलों को हाथ न लगाना ।

यह सब विषैले हो गए हैं । यह लो, स्वर्ग का फल । इसके खाने से तुम्हारे दुख शीघ्र ही दूर हो जाएंगे ।” यह कहकर परी ने उसे एक फल दिया और अंतर्धान हो गई । फल लेकर जैसे-तैसे येरान घर लौटा और पड़ोसी के बच्चों को दे दिया । फल खाते ही उनके चेहरे खिल उठे ।

येरान थका-मांदा सो गया । रात आधी ही बीती होगी कि परी फिर प्रकट हुई । उसने येरान से कहा : ”फल तो तुमने दूसरों में बांट दिया, जबकि तुम स्वयं भी बहुत भूखे हो और मुसीबत में हो । अब अच्छा यही रहेगा कि तुम लोग अभी यह गांव छोड़कर कुछ समय के लिए जंगल के उत्तर में चले जाओ ।”

”पर इस घोर अंधेरे में हम उस भयानक जंगल के बीच रास्ता कैसे खोज पाएंगे ?” येरान ने पूछा ।  ”अपना दायाँ हाथ दिखाओ ।” परी बोली । येरान के हाथ को उसने अपनी छड़ी की नोक से ध्वुा ही था कि प्रकाश का एक तेज सैलाब फूट पड़ा । ऐसा लगा जैसे सूरज निकल आया हो ।

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परी ने कहा : ”अब उजियारा तुम्हारी मुट्‌ठी में है । उठो और निकल पड़ी यात्रा पर ।” येरान ने सबको जगाया । उसके हाथ से प्रकाश फूटता देखकर सभी चकित थे । पूरा गांव येरान के पीछे चल पड़ा । रास्ता कठिन था, पर सब एक-दूसरे को संभालते, सहारा देते आगे बढ़ते जा रहे थे ।

तभी एक औरत बोल उठी : ”तोशा! तेरी डयोढी में वह बुढ़िया थी न, वह शायद वहीं रह गई ।” तोशा ने उस औरत की बात सुनकर भी अनसुनी कर दी, लेकिन लोग खुसर-फुसर करने लगे । बात येरान के कानों तक पहुंची । ”तुम सब यही ठहरो । मैं उसे लेकर आता हूं ।” येरान ने कहा ।

लोग चीखे : ”नहीं, तुम इस अंधेरे भयानक जंगल में हमें यूं छोड़कर नहीं जा सकते । जंगल के खतरनाक जानवर हमें खा जाएंगे ।” येरान ने उन्हें समझाने का प्रयास किया : ‘जंगली जानवर बिना कारण किसी पर हमला नहीं करते । तुम सब यही इकट्‌ठे होकर बैठ जाओ । मैं वह गया और यह आया ।’

”नहीं, अगर तुम्हें जाना ही है तो अपना यह रोशनी वाला हाथ देते जाओ ।” एक ने कहा और एक झटके में कटार से उसका हाथ काट लिया । येरान कष्ट सहते हुए भी मुस्कराया और गांव की ओर लौट चला । येरान जब उस बुढ़िया को लेकर आया तो भोर का हल्का उजाला ज्जै चुका था ।

उसने देखा कि उसके सभी साथी इधर-उधर बेहोश पड़े हैं । उसका कटा हुआ हाथ भी वहीं पड़ा था, किंतु उसमें से प्रकाश नहीं फूट रहा था । वह उदास हो गया । तभी उसे सुनहरी परी की आवाज सुनाई दी : ‘येरान! ये सब स्वार्थी और लोभी व्यक्ति थे ।

इन्होंने जंगल के फल खाए और बेहोश हो गए । तुम बुढिया को लेकर उत्तर दिशा में आगे बढ़ जाओ । हमने तुम्हारे लिए वहां एक सुनहरी महल बनवाया है । अब देर न करो ।” ”पर तुम हो कहां ? मुझे दिखाई क्यों नहीं देती ?” येरान ने पूछा ।

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परी बोली : ”तुम दिन के उजाले में मुझे नहीं देख सकते । मैं तो तुम्हारे सामने खड़ी हूं । तुमसे जो कहा गया है, वह जल्दी करो ।” ”मगर मैं अपने इन साथियों को इस हालत में छोड्‌कर कैसे चला जाऊं ? इन्हें मैं ही तो यहां लाया था ।”

”क्या तुमने उसे भी क्षमा कर दिया, जिसने तुम्हारा हाथ काटा था?” परी ने सवाल किया । हार शायद हफ्तों की भूख और जंगली जानवरों के डर के कारण उसने ऐसा किया होगा ।” येरान ने कहा । ”ठीक है । अब तुम अपना कटा हुआ हाथ उठाओ और जोड़ लो ।” परी ने कहा ।

येरान ने अपना कटा हुआ हाथ जमीन पर से उठाकर जोड़ लिया । हाथ ऐसे जुड़ गया, जैसे कभी कटा ही न हो । उंगलियां भी पहले की तरह काम करने लगी । तभी परी ने कहा : ”यह हाथ तुम जिसके भी सिर पर रखोगे, वह भला-चंगा हो  जाएगा ।

तुम्हारे इस हाथ में अनोखी शक्तियां आ जाएंगी । येरान ! अब मैं जा रही हूँ ।” कुछ पल के लिए जंगल में सन्नाटा छा गया । येरान स्तब्ध खड़ा रहा । तभी बुढ़िया ने कहा : ”बेटा! अब इन दुष्टों के सिर पर अपना हाथ फेर दो ।”

येरान ने वैसा ही किया । सब यूं उठ बैठे जैसे गहरी नींद से जागकर उठ रहे ही । येरान के हाथ को काटने वाले युवक ने येरान के पांव पकडू लिए और फूट-फूटकर रोने लगा । येरान ने उसे उठाकर अपने सीने से लगा लिया ।

येरान की जय-जयकार से सारा जंगल गूंज उठा । सभी पक्षियों ने जंगल के हर कोने में चहचहाना शुरू कर दिया, मानो वे भी येरान की जय-जयकार कर रहे हो । तोशा ने येरान को अपने कंधे पर उठा रखा था और दूसरे युवक ने बुढ़िया को ।

प्रातःकाल दहली किरण के धरती पर पड़ने से पहले ही वे सब जंगल पार कर चुके थे । सामने झील के तट पर सुनहरी महल दमक रहा था । महल के तीन ओर फलों से लदे बगीचे थे । महल बहुत बड़ा था । येरान ने सबको रहने के लिए जगह दे दी, तब भी कई कमरे खाली रह गए ।

येरान ने अपने लिए भी एण्ड कमरा चुन लिया और बुड़िया को अपने साथ ही रख लिया । महल के गोदामों में तरह-तरह के कपड़े, बढ़िया बिस्तर और ढेर सारा अनाज था । दिन-भर सबने खूब खाया-पिया और मौज-मस्ती की ।

शाम को येरान ने सबको इकट्‌ठा किया और कहा : ‘साथियो! कल प्रात: से हम सभी पुरुष बागों के परे उन खेतों में जुताई करेंगे और फसलें उगाणो । मिश्किन चाचा बच्चों को पढ़ाया करेंगे । हमारी मां-बहनें घर के काम करेंगी । यह महल और इसकी वस्तुएं किसी की अमानत हैं ।

हम फिलहाल तो इससे अपना काम चला रहे हैं, किंतु जाने से पहले इनकी पूरी भरपाई कर देंगे ।” सबने प्रसन्नतापूर्वक येरान की बात मान ली । उस रात येरान को बहुत अच्छी नींद आई । पर आधी रात के समय किसी ने उसके बालों में हाथ फेरकर आवाज दी : ”येरान! मेरे साथ परी लोक चलोगे ?”

येरान उठ बैठा । सुनहरी परी उसके सिरहाने बैठी हुई थी । ”चलोगे मेरे साथ?” परी ने फिर पूछा । “किंतु मुझे तो मेरी धरती ही प्यारी है और मेरे साथी मुझसे बहुत प्यार करते है ।” येरान ने कहा ।  ”तो ठीक है । मैं भी साधारण स्त्री बन जाती हूँ ।” कहते हुए परी ने अपने दोनों पंख उतार ।

बोली: ”तुम जैसे नेक और वीर की पत्नी बनकर मैं बहुत सुखी रहूंगी । परी लोक या स्वर्गलोक में ऐसा सुख कहां ?” ”मगर सुनहरी परी । मैं केवल अपने सुख के लिए तुम्हें कष्ट नहीं दूंगा । बेरन ने कहा फिर उसने परी के पंख उठाए और उन्हें फिर से जोड़ते हुए बोला : ”हम मानव वही तक देख पाते हैं, जहां तक हमारी औखें हमें दिखाती हैं, लेकिन तुम परियां तो धरती के हर कण को देखती रहती हो ।

मुझ जैसे न जाने कितने येरान अंधेरों में भटक रहे होंगे । उनको प्रकाश चाहिए । उन्हें रास्ता दिखाओ । हे परी! तुम लौट जाओ अपने परी लोक में ।” परी की आखें छलछला आईं । बोली : ”पता नहीं ईश्वर इतने अच्छे ईसान क्यों बनाता है ?” परी की आखों से आसू की दो बूंदें येरान के हाथों पर गिरकर मोती बन गई थी और सुनहरी परी जा चुकी थी ।

शिक्षा:

कहानी को पढ़कर तुम्हें मालूम हो गया होगा कि येरान ने क्यों परी के साथ परी लोक या स्वर्गलोक में जाने से इंकार कर दिया । दरअसल, जो अपने देश के माटी से प्यार करते हैं, उनके लिए अपना देश स्वर्ग से भी बढ़कर सुदंर होता है । हमें भी अपने दशे की मिट्‌टी से वैसा ही प्यार करना चाहिए, जैसा येरान ने किया था । कहा गया है : ‘जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादिपि गरीयसी ।

By Ruchi

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