परी की दयालुता

परी की दयालुता – किसी नगर में एक अमीर आदमी रहता था । उसके पास बहुत पैसा था । शहर भर में उसका बहुत नाम था, किंतु इतना सब होते हुए भी उसमें घमंड नहीं था । वह दीन-फुखइयों की सहायता किया करता था ।

उसकी हवेली में मांगने वालों की हमेशा भीड़ लगी रहती थी, पर दूसरों को खुशी देने वाला वह अमीर हमेशा उदास-उदास दिखाई पड़ता था । वह ही नहीं, उसकी पत्नी भी हमेशा चिंता में डूबी रहती थी । इसका कारण था उनके घर में संतान का न होना ।

दोनों पति-पत्नी यही सोचते रहते थे कि उनके बाद इस सारी धन-दौलत का क्या होगा ? उनकी हवेली के साथ एक बहुत खूबसूरत बगीचा भी था । उस बगीचे में संग मरमर की बनी हुई कई आदमकद शुत खड़ी थी । अमीर की पत्नी को सलीके से जिंदगी बिताने का बेहद शौक था, इसलिए उसने बगीचे में परियों की मूर्तियों के पास अपने बैठने के लिए खूबसूरत जगह बनवाई हुई थी ।

यहां अनेक रंग-बिरंगे क्य खिले थे । अमीर की पत्नी माली से फूलों की मालाएं बनवाती और स्वयं आकर परियों के गले में पहनाया करती थी । एक दिन अमीर की पत्नी संतान की चिंता में बहुत ही उदास थी । उस दिन उसका जन्म दिन भी था ।

वह चुपचाप बगीचे में आकर बैठ गई और मन-ही-मन सोचने लगी : ‘बिना सतान के भी कोई गृहस्थ जीवन है । बिना बच्चों के हवेली कैसी सूनी-सूनी दीख पड़ती है ।’ बहुत देर तक वह इन्हीं विचारों में खोई रही । थोड़ी देर बाद पक्षियों का चहचहाना सुनकर उसका ध्यान टूटा ।

इसे भी पढें: पर्मेस्वर का संदेश

दूर-दूर से आकर पक्षी रैन बसेरा करने के लिए पेड़ों पर बैठ रहे थे । तभी उसने जाना कि दिन ढल रहा है । आज उसकी हवेली में जन्म दिन समारोह का भी आयोजन किया गया था । उसने सोचा : ‘जल्दी से हवेली में चलूं । पतिदेव मुझे ढूँढ रहे होंगे ।’

जैसे ही वह उठी, उसे गुनगुनाहट की मीठी आवाज सुनाई दी । वह सोचने लगी : “अरे बगीचे में कौन आ गया ? यहां तो किसी को भी आने की आज्ञा नहीं है । फिर यह आवाज तो किसी नारी की लगती है ।” यह सोचकर वह इथर-उधर देखने लगी ।

तभी श्वेत वस्त्र धारण किए एक बहुत सुंदर लड़की उसके सामने आ खड़ी हुई । उसे देखकर अमीर की पत्नी को आश्चर्य हुआ कि बाग में परियों की प्रतिमाओं में से एक परी का जो मुकुट था, वैसा ही मुकुट और ताजे फूलों की माला इस लड़की ने पहन रखी थी ।

”क्यों, मुझे पहचाना नहीं?” मुस्कराकर लड़की ने पूछा । सुनकर भी गृह-स्वामिनी चुप खड़ी रही । उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि वह क्या उत्तर दे । फिर वह बोली : ”कैसे पहचानूंगी ? मैंतुम्हें पहली बार देख रही हूं । तुम इतनी सुंदर हो इस शहर की तो लगती नहीं । कहा से आई हो ?”

लड़की बोली : ”रहने वाली तो मैं परी लोक की हूं मगर तुम्हारे बाग में भी तो हम रहती है । तुमने जो प्रतिमाएं लगाई हैं, वे हमें बहुत अच्छी लगती हैं । अक्सर पूनम की रात में हम इस बाग में आती हैं । तुम परियों से प्यार करती हो न ।”

अमीर की पत्नी गौर से उस लड़की को देखती हुई बोली : ”तो तुम परी हो, तभी इतनी सुंदर हो । तुम्हारेछोटे-छोटे पंख कितने सुंदर लग रहे हैं । मुझे सचमुच परियां बहुत अच्छी लगती हैं । तुम मुझे बहुत पसंद हो ।” परी बोली : “मगर परियांतो फूलेकी तरह हंसती-खिलखिलाती रहती हैं ।

तुम परियों को प्यार तो करती हो, फिर इतनी उदास क्यों रहती हो ? हमारी तरह खिलखिलाकर हंसो ।” यह सुनकर अमीर की पत्नी का दुख उसकी आखों में भर आया । उसकी आखों से औसूटपक पड़े । फिर उसने अपने सारे दुखों को परी के सामने उड़ेलकर रख दिया ।

”दुखी मत हो ।श परी बोली: ”मैं तुम्हारी इच्छा पूरी करूंगी ।” सुनकर अमीर की पत्नी बोली : ”क्या तुम सचमुच मुझे संतान दे सकती हो ?” ”हां-हां, क्यों नहीं । ध्यान से सुनो ।” परी ने कहा: ”तुम कल सुबह नहा-धोकर इसी स्थान पर आ जाना ।

उस सामने वालेपेड़ परोंदोसेब लटकतेहुए मिलेंगे । बिना किसी कोबताए तुम उन्हें छीलकर खा लेना । फिर देखना, तुम्हारेएक नहीं, दोसुंदर पुत्र पैदा होंगे । अब जाओ, घूमधाम से अपना जन्मदिन मनाओ ।” इतना कहकर परी अंतर्धान हो गई ।

दूसरे दिन अमीर की पत्नी नहाकर बिना किसी को बताए सीधे बाग में पहुंची । वह जल्दी-से-जल्दी सेब देखना और खाना चाहती थी । सामने ही पेड़ पर उसे दो सेब लटकते दिखाई दे गए । सेबों को देखकर अमीर की पत्नी खुश हो गई । खुशी में वह परी की बात भूल गई और एक सेब को बिना छीले ही खा गई ।

तभी उसे याद आया कि परी ने तो उसे सेब छीलकर खाने को कहा था । तब उसने दूसरा सेब छीलकर खाया । धीरे-धीरे समय बीता । थोड़े दिन बाद अमीर की पत्नी ने दो जुड़वा लडुकों को जन्म दिया । उनमें से पहला लड़का तो एकदम काला और कुरूप था ।

उसे देखकर सब डर गए । मगर दूसरा लड़का बहुत ही खूबसूरत किसी राजकुमार जैसा था । धीरे-धीरे दोनों बच्चे बड़े होने लगे । दोनों ही बहादुर, विनम्र और होशियार थे । अमीर की पली अपने दोनों बेटी से समान रूप से प्यार करती थी, लेकिन घर के नौकर-चाकर और स्वयं अमीर भी उस कुरूप लड़के से नफरत करते थे ।

दोनों जवान हुए तो उनकी शादी की बात शुरू हुई । जो भी रिश्ता आता, छोटे लड़के के लिए ही आता । मां को यह देखकर बहुत दुख होता । एक दिन उसका बड़ा बेटा बोला : ”मां! तुम इतनी दुखी क्यों रहती हो ? मैं जानता हूं तुम मुझे बहुत प्यार करती हो । तुम उदास होती हो तो मैं भी दुखी हो जाता हूं ।”

मां ने कहा : ”बेटा! भगवान ने तुम्हारे साथ अन्याय किया है, लेकिन मैं भगवान को ही क्यों दोष दूं ? यह तो मेरी भूल का नतीजा है, मैं ही इसका प्रायश्चित करूंगी ।” पूनम की रात थी । मां बगीचे में इसी तरह उदास बैठी बड़े बेटे के बारे में सोच रही थी ।

इसे भी पढें:परीलोक से मिला निमंत्रण

पास ही बड़ा बेटा भी बैठा था । मां बीस साल पहले परी से मिलने की कहानी बेटे को सुना रही थी ।  सुनाते-सुनाते मा को नींद आ गई । बेटा मा की सुनी कहानी के अनुसार एक परी की चुतइr के पास जाकर खड़ा हो गया । वह सोचने लगा : ‘मां ने यह भी तो बताया था कि पूनम की रात को यहां परियां आती हैं ।

काश ! आज परियां आ जाएँ और मेरा दुख दूर कर दे ।’ तभी छम-छम की आवाज सुनाई दी । उसने इधर-उधर देखा, श्वेत वस्त्र पहने एक सुंदर परी नाच रही थी । वह मंत्र-मुग्ध-सा होकर उसे देखता रह गया । परी नाच चुकी तो उस लड़के के पास आई ।

लड़का उसे देखता ही रहा । समझ में नहीं आ रहा था कि वह उस लड़की से क्या  कहे ? तभी परी बोली : ”तुम मुझे नहीं पहचानते, मैं तुम्हें जानती हूं । तुम्हें ही नहीं, तुम्हारा दुख भी जानती हूं । जाओ, तुम अपने कमरे में जाकर सो जाओ ।

बस एक काम करना, खिड़की खुली ही रखना । सुबह उठोगे तो तुम्हारा दुख दूर हो चुका होगा ।” इतना कहकर परी चली गई । लड़का कमरे में आकर सो गया । रात को उसे लगा, जैसे खिड़की से आती दूधिया किरणें उसके शरीर को ठंडक पहुंचा रही हैं ।

वह एक बार को सिहर उठा । फिर करवट बदलकर सो गया । सुबह जब वह बहुत देर तक नहीं उठा तो मां ने आकर उसके कमरे का दरवाजा खटखटाया । लड़के ने दरवाजा खोला तो मा हैरान होकर बोली : ”तुम कौन हो और इस कमरे में क्या कर रहे हो ?”

”मां! तुमने मुझे पहचाना नहीं । मैं तुम्हारा लाडला, तुम्हारा बड़ा बेटा ही तो हूं ।”  लड़का बोला । ”बेटे! सच, तुम मेरे बेटे हो । फिर तो यह चमत्कार हो गया । जाकर शीशे में अपना चेहरा तो देखो ।” मां खुशी से बोली । दोनों मां-बेटे दौड़कर शीशे के सामने गए ।

उसने जब अपना चेहरा देखा तो हैरान रह गया । खुशी से चहकता हुआ वह बोला : “यह उस परी का कमाल है मां! जो कल रात मुझे मिली थी ।” मां बोली : ”हां बेटे! उसी परी ने मेरी इच्छा पूरी भी की थी और उसी ने तुम्हारी सूरत भी बदल दी । सच ही कहा जाता है कि परियां बहुत दयालु होती हैं ।” यह कहते हुए मां-बेटे को लेकर बगीचे में गई, मगर वहां परी नहीं थी । परियों की मूर्तियां खड़ी मुस्करा रही थी ।

शिक्षा:

परियां ही नहीं, दूसरे प्राणी भी अपने मन पे दयालुता का भाव रखते हैं । जरूरत होती है उनके साथ अच्छे व्यवहार की । यदि अप किसी के ऊपर दयालुता भाव रखेंगे तो जरूरी है कि बह तुम्हारे व्यवहार से प्रभावित होकर अपना नजरिया बदलेगा तुम्हारे साथ भी दयालुता का ही व्यवहार करेगा । अत: प्राणी-मात्र के साथ दयालुता का व्यवहार ही करना चाहिए ।

By Ruchi

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *